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कलम की ताकत : संगीता शर्मा



हाँ यह सच है 
यह सच है कि 
तुम्हारे पास कलम है 

कलम की ताकत है 

तुम लिख सकते हो शांत नीला नभ 
सुदूर फैली हरीतिमा 
अडिग प्रहरी सी विद्यमान पर्वतमालाएं 
प्रकृति का रुदन / क्रंदन 
मेघों का गर्जन 
पहाड़ों की दरकन 
स्नेहिल धूप का खेतो में 
फसल बन लहराना 
वेद / उपनिषद / सुभाषितानी
हर मौसम से अप्रभावित मन / मस्तिष्क 
मजदूर के पसीने की दुर्गंध 
स्त्रियों की सिसकियाँ 
पतझड़ में पत्तों का डालियों से गिरना 
दुधमुंहे की हँसी 
पक्षियों का कलरव 
आदि / इत्यादि……………………

परन्तु कुछ पल के लिए ही सही 
ज़रा सोचों उस नन्हे के बारे में भी 
जो तुम्हे घर से बस स्टॉप के बीच स्कूल जाने के लिए 
टूटी चप्पल हाथ में उठाएँ 
गर्म हवा के थपेड़े सहता हुआ 
सड़क की लम्बाई नापता 
अक्सर मिलता है राह चलते 
जब तुम विराजमान होते हो 
अपनी वातानुकूलित / डिलक्स / सदान कार में 
और अपने पापा से बार - बार शिकायत करते हो 
झुलसाती दुपहरी की..............

क्या तुम्हें बिल्कुल भी याद नहीं आते 
उसके साथ कक्षा में बांटे
अपने सुख - दुःख के पल / हँसी - ठिठोली 
फिर ऐसा क्या है 
जो तुम्हें रोकता है 
किंचित मात्र भी दया नहीं उपजती 
तुम्हारे ह्रदय - पटल पर 
कि मैं गाड़ी पर चढ़े शीशे खोल
उसे आवाज़ दूँ 
हाथ बढ़ाऊँ उसके लिए……………….

तुम्हारा तनिक मात्र प्रयास भी 
एक और सशक्त कलम को 
पैना / धारदार कर सकता है
दे सकता है उसे जुझारुंपन 
पर शायद तुम नहीं चाहते 
अपना कोई " सानी "
यही कारण है कि तुम निरंतर
किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में संलिप्त हो……………

परन्तु अब नहीं……………. 
अब नहीं..............
अब तुम उठों / बढों / रुकों नहीं दौड़ों 
और उस जैसी एक नहीं 
अनेक……………….
धारदार / पैनी / तीक्ष्ण 
कलम की निर्मिति करों
यही तुम्हारी नियति है................


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